शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

एजोला का उत्पादन


  • पहले क्षेत्र की ज़मीन की खरपतवार को निकाल कर समतल किया जाता है।
  • ईटों को क्षैतिजिय, आयताकार तरीके से पंक्तिबद्ध किया जाता है।
  • 2 मीटर X 2 मीटर आकार की एक यूवी  स्थायीकृत सिल्पोलिन शीट को ईटों पर एक समान तरीके से इस तरह से फैलाया जाता है कि ईटों द्वारा बनाये गये आयताकार रचना के किनारे ढंक जाएं।
  • सिल्पोलिन के गड्ढे पर 10-15 किलो छनी मिट्टी फैला दी जाती है।
  • 10 लिटर पानी में मिश्रित 2 किलो गोबर एवं 30 ग्राम सुपर फॉस्फेट से बना घोल, शीट पर डाला जाता है। जलस्तर को लगभग 10 सेमी तक करने के लिए और पानी मिलाया जाता है।  
  • एजोला  क्यारी में मिट्टी तथा पानी के हल्के से हिलाने के बाद लगभग 0.5 से 1 किलो शुद्ध  मातृ  एजोला  कल्‍चर बीज़ सामाग्री पानी पर एक समान फैला दी जाती है।  संचारण के तुरंत बाद एजोला के पौधों को सीधा करने के लिए एजोला पर ताज़ा पानी छिड़का जाना चाहिए।
  • एक हफ्ते के अन्दर, एजोला पूरी क्‍यारी में फैल जाती है एवं एक मोटी चादर जैसा बन जाती है।
  • एजोला की तेज वृद्धि तथा 50 ग्राम दैनिक पैदावार के लिए, 5 दिनों में एक बार 20 ग्राम सुपर फॉस्फेट तथा लगभग 1 किलो गाय का गोबर मिलाया जाना चाहिए।
  • एजोला  में खनिज की मात्रा बढ़ाने के लिए एक-एक हफ्ते के अंतराल पर मैग्नेशियम, आयरन, कॉपर, सल्फर आदि से युक्त एक सूक्ष्मपोषक भी मिलाया जा सकता है।
  • नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ने तथा सूक्ष्मपोषक की कमी को रोकने के लिए, 30 दिनों में एक बार लगभग 5 किलो क्‍यारी की मिट्टी को नई मिट्टी से बदलनी चाहिए।
  • क्‍यारी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ने से रोकने के लिए, प्रति 10 दिनो में एक बार, 25 से 30 प्रतिशत पानी भी ताज़े पानी से बदला जाना आवश्यक होता है।
  • प्रति छह महीनों में क्‍यारी को साफ किया जाना चाहिए, पानी तथा मिट्टी को बदला जाना चाहिए एवं नए एजोला का संचारण किया जाना चाहिए।
  • कीटों तथा बीमारियों से संक्रमित होने पर एजोला के शुद्ध कल्‍चर से एक नयी  क्‍यारी तैयार तथा संचारण किया जाना चाहिए।

       पूर्ण विकसित एजोला
        
                                                   उत्पादन के लिए गड्ढे

एजोला चारा/भोजन


  • यह प्रोटीन, आवश्यक अमीनो एसिड, विटामिन (विटामिन ए, विटामिन बी-12 तथा बीटा-कैरोटीन), विकासवर्धक सहायक तत्वों एवं कैल्शियम, फॉस्फोरस, पोटैशियम, फैरस, कॉपर, मैगनेशियम से भरपूर
  • शुष्क वज़न के आधार पर, उसमें 25-35 प्रतिशत प्रोटीन, 10-15 प्रतिशत खनिज एवं 7-10 प्रतिशत अमीनो एसिड, बायो-एक्टिव पदार्थ तथा बायो-पॉलीमर होते हैं।
  • इसके उच्च प्रोटीन एवं निम्न लिग्निन तत्‍वों के कारण मवेशी इसे आसानी से पचा लेते हैं।
  • एजोला सान्द्र के साथ मिश्रित किया जा सकता है या सीधे मवेशी को दिया जा सकता है।
  • कुक्कुट, भेड़, बकरियों, सूअर तथा खरगोश को भी दिया जा सकता है। 

एजोला के बारे में



  • एजोला शैवाल से मिलती जुलती एक तैरती हुई फर्न है।
  • सामान्‍यत: एजोला धान के खेत या उथले पानी में उगाई जाती है।
  • यह तेजी से बढ़ती है।

                                    एजोला

व्यावसायिक डेयरी फार्म के लिये सही नस्ल का चुनाव- सुझाव


  • भारतीय स्थिति के अनुसार किसी व्यावसायिक डेयरी फार्म में न्यूनतम 20 जानवर होने चाहिये जिनमें 10 भैंसें हो व 10 गायें। यही संख्या 50:50 अथवा 40:60 के अनुपात से 100 तक जा सकती है।  इसके पश्चात् आपको अपने पशुधन का आकलन करने के बाद बाज़ार मूल्य के आधार पर आगे बढ़ाने के बारे में सोचना चाहिये।
  • मध्य वर्गीय, स्वास्थ्य के प्रति जागरूक भारतीय जनमानस सामन्यतः कम वसा वाला दूध ही लेना पसंद करते है।  इसके चलते व्यावसायिक दार्म का मिश्रित स्वरूप उत्तम होता है। इसमें संकर नस्ल, गायें और भेंसे एक ही छप्पर के नीचे अलग अलग पंक्तियों में रखी जाती है।
  • जितना जल्दी हो सके, बाज़ार की स्थिति देखकर तय कर लें कि आप दूध को मिश्रित दूध के व्यापार के लिये किस से स्थान का चुनाव करेंगे। होटल भी आपके ग्राहकी का 30 प्रतिशत हो सकते है जिन्हे भैंस का शुद्ध दूध चाहिये होता है जबकि अस्पताल व स्वास्थ्य संस्थान शुद्ध गाय का दूध लेने को प्राथमिकता देते है।
व्यावसायिक फार्म के लिये गाय अथवा भैंस की नस्ल का चुनाव करना
गाय
  • बाज़ार में अच्छी नस्ल व गुणवत्ता की गायें उपलब्ध है व इनकी कीमत प्रतिदिन के दूध के हिसाब से 1200 से 1500 रूपये प्रति लीटर होती है। उदाहरण के लिये 10 लीटर प्रतिदिन दूध देनेवाली गाय की कीमत 12000 से 15000 तक होगी।
  • यदि सही तरीके से देखभाल की जाए तो एक गाय 13 - 14 महीनों के अंतराल पर एक बछडे क़ो जन्म दे सकती है। 
  • ये जानवर आज्ञाकारी होते है व इनकी देखभाल भी आसानी से हो सकती है। भारतीय मौसम की स्थितियों के अनुसार होलेस्टिन व जर्सी का संकर नस्ल सही दुग्ध उत्पादन के लिये उत्तम साबित हुए है। 
  • गाय के दूध में वसा की मात्रा 3.5 से 5 प्रतिशत के मध्य होता है व यह भैंस के दूध से कम होता है। 
भैंस
  • भारत में हमारे पास सही भैंसों की नस्लें है, जैसे मुर्रा और मेहसाणा जो कि व्यावसायिक फार्म की दृष्टि से उत्तम है। 
  • भैंस का दूध बाज़ार में मक्खन व घी के उत्पादन के लिये मांग में रहता है क्योंकि इस दूध में गाय की दूध की अपेक्षा वसा की मात्रा अधिक होती है। भैंस का दूध, आम भारतीय परिवार में पारंपरिक पेय, चाय बनाने के लिये भी इस्तेमाल होता है। 
  • भैंसों को फसलों के बाकी रेशों पर भी पोषित किया जा सकता है जिससे उनकी पोषणलागत कम होती है।
  • भैंस में परिपक्वता की उम्र देरी से होती है और ये 16-18 माह के अंतर से प्रजनन करती है। नर भैंसे की कीमत कम होती है।
  • भैंसो को ठन्डा रखने के साधनों की आवश्यकता होती है, जैसे ठन्डे पानी की टंकी, फुहारा या फिर पंखा आदि। 
स्रोत :गोकुल धाम गौशाला ,महिनाम 

दुधारू नस्लों के चुनाव के लिये सामान्य प्रक्रिया


  • दुधारू नस्लों के चुनाव के लिये सामान्य प्रक्रिया
दुधारू गायों का चुनाव
बछड़ो के झुंड से बछड़ा चुनना व मवेशी मेला से गाय चुनना भी कला है। एक दुधारू किसान को अपना गल्ला बनाकर काम करना चाहिये। दुधारू गाय को चुनने के लिये निम्न बिंदुओं को ध्यान में रखा जाना .
चाहिये-
  • जब भी किसी पशु मेले से कोई मवेशी खरीदा जाता है तो उसे उसकी नस्ल की विशेषताओं और दुग्ध उत्पादन की क्षमता के आधार पर परखा जाना चाहिये।
  • इतिहास और वंशावली देखी जानी चाहिये क्योंकि अच्छे कृषि फार्मों द्वारा ये हिसाब रखा जाता है।
  • दुधारू गायों का अधिकतम उत्पादन प्रथम पांच बार प्रजनन के दौरान होता है। इसके चलते आपका चुनाव एक या दो बार प्रजनन के पश्चात् का होना चाहिये, वह भी प्रजनन के एक महीने बाद। 
  • उनका लगातार दूध निकाला जाना चाहिये जिससे औसत के आधार पर उसकी दूध देने की क्षमता का आकलन किया जा सके। 
  • कोई भी आदमी गाय से दूध निकालने में सक्षम हो जाये और उस दौरान गाय नियंत्रण में रहे।
  • कोई भी जानवर अक्टूबर व नवंबर माह में खरीदा जाना सही होता है।
  • अधिकतम उत्पादन प्रजनन के 90 दिनों तक नापा जाता है। 
अधिक उत्पादन देने वाली गाय नस्ल की विशेषताएं
  • आकर्षक व्यक्तित्व मादाजनित गुण, ऊर्जा, सभी अंगों में समानता व सामंजस्य, सही उठान। 
  • जानवर के शरीर का आकार खूँटा या रूखानी के समान होनी चाहिये।
  • उसकी आंखें चमकदार व गर्दन पतली होनी चाहिये।
  • थन पेट से सही तरीके से जुडे हुए होने चाहिये।
  • थनों की त्वचा पर रक्त वाहिनियों की बुनावट सही होनी चाहिये।
  • चारो थनों का अलग-अलग होना व सभी चूचक सही होनी चाहिये। 

भैंसों की नस्लें


भैंसों की नस्लें
मुर्रा
  • हरियाणा, दिल्ली व पंजाब में मुख्यतः पाई जाती है।
  • दुग्ध उत्पादन- 1560 किलोग्राम
  • इसका औसतन दुग्ध उत्पादन 8 से 10 लीटर प्रतिदिन होता है जबकि संकर मुर्रा एक दिन में 6 से 8 लीटर दूध देती है।
  • ये तटीय व कम तापमान वाले क्षेत्रों में भी आसानी से रह लेती है।

सुरती
  • गुजरात
  • 1700 से 2500 किलोग्राम

ज़फराबादी:
  • गुजरात का काठियावाड जिला
  • 1800 से 2700 किलोग्राम

नागपुरी
  • महाराष्ट्र के नागपुर, अकोला, अमरावती व यवतमाल क्षेत्र में
  • दुग्ध उत्पादन- 1030 से 1500 किलोग्राम 

डेयरी नस्लें


जर्सी
  • प्रथम बार प्रजनन की उम्र- 26-30 महीने
  • प्रजनन की अवधि में अंतराल- 13-14 महीने
  • दुग्ध उत्पादन- 5000-8000 किलोग्राम
  • डेयरी दुग्ध की नस्ल रोज़ाना 20 लीटर दूध देती है जबकि संकर नस्ल की जर्सी 8 से 10 लीटर प्रतिदिन दूध देती है।
  • भारत में इस नस्ल को मुख्यतः गर्म व आर्द्र क्षेत्रों में सही पाया गया है।
 
होल्स्टेन फेशियन
  • यह नस्ल हॉलैंड क़ी है।
  • दुग्ध उत्पादन- 7200-9000 किलो ग्राम
  • यह नस्ल दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में सबसे उम्दा नस्ल मानी गई है। औसतन यह प्रतिदिन 25 लीटर दूध देती है जबकि एक संकर नस्ल की गाय 10 से 15 लीटर दूध देती है।
  • यह तटीय व डेल्टा भागों में भी अच्छी तरह से रह सकती है।